Sunday, December 30, 2012

विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मलेन


कल मैंने विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मलेन की वार्षिक सदस्यता ली.... नागपुर स्थित यह  संस्था कला, साहित्य, संस्कृति, सृजन आदि के लिये समर्पित है.

कल इसका वार्षिक अधिवेशन भी था. चूंकि मैं नया था, इसलिए मैंने एक सज्जन से इस संस्था की गतिविधियों के बारे में उनसे पूछा. उन्होंने बताया कि यहाँ वर्ष भर विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक क्रियाकलाप होते रहते हैं. यहाँ युवा कलाकारों को साहित्य, सृजन, नृत्य, रंगमंच आदि कला के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा को प्रस्तुत करने का अवसर भी मिलता है.

फिर अंत में उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि यहाँ आपको चलना सिखा दिया जाता है... लेकिन उड़ना आपको खुद ही होगा... और पंख भी आपके ही होंगे.

मैंने उन्हें विनम्रता से उत्तर दिया: सर, चल भी मैं खुद ही लूँगा.. बस मुझे ज़मीन चाहिए.

Friday, November 23, 2012

चलना मेरा जीवन


बढ़े कदम हैं आज
भले हों कष्ट
अगिन अवरोध
मार्ग में कंट
नयन निर्लक्ष्य
साँस थक-थक
चाल धीमी ही क्यों न हो जाए!
चलना ही है ध्येय
इसी का मैं अभिलाषी हूँ.

लक्ष्य बिना साकार नहीं
जीवन कोई,
ये सुना.
विजय का ही सर्वोच्च मूल्य
ये सुना.
निरंतर.
पर जीवन क्या नहीं
प्रवाह अविरल,
गति हर क्षण?
एक बिंदु क्या हो सकती
परिभाषा मार्ग अनंत की?
असंख्य नरों से रचित
वृहद् ब्रह्माण्ड,
किन्तु फिर भी संघर्ष
अहम्, जीत, अभिमान,
चहुँदिश स्व का ही गुणगान.

स्व की हार से
अधिक प्रफुल्लित होऊं
मैं ऐसा प्राणी हूँ.
लक्ष्य एक का नहीं
मार्ग अविरल का
किन्तु पुजारी हूँ.
सूख, वृक्ष से गिरे कभी
वो पात नहीं, चिंगारी हूँ.
कृपादृष्टि की चाह नहीं,
मैं मानवता-व्रत धारी हूँ. 

Sunday, July 29, 2012

सपने


सपने कभी बूढ़े नहीं होते
कभी मरते हैं
भले टूट जाएँ
बेआवाज़
भले हम उन्हें दफ़न कर दें
जिन्दा ही.
टुकड़े हुए सपनों की
जिंदगियां जुड़ जाती हैं
और वे अमर हो जाते हैं.
हम भी तो सपने ही हैं
टूटते हैं बेआवाज़
दफ़न होते जिन्दा
पर मरते नहीं
जीते हैं टुकड़ों में 
ज़िन्दगी रिस रिसकर 
बह जाती है हमसे,
हम टुकड़ों से.
सपने हमको जीते हैं
श्वांस से श्वांस तक
कभी मरते नहीं
टूटकर - बिखरकर
जिन्दा दफ़न हो कर
पर कभी बूढ़े नहीं होते
और मरते भी नहीं.

Friday, July 20, 2012

द्वैत


इन्द्रियाँ पहचान
सीमित क्षण तक
बाधित दृष्टि
अगणित क्लेश
द्वेष-राग से युक्त
सर्वत्र अहम्
अनवरत!
वंचना बहुरत्नों से
जो हैं सार मनुजता के
विवेक, सृजन,
परादृष्टि,
चैतन्य और अभेद.
वंचित, दरिद्र.
दासता स्वयं की
सीमित अपनी ही सीमाओं से
व्यथा स्वरचित
दृष्टि स्वबाधित
कारण अनन्य
सिर्फ मैं!
मैं केवल क्षुद्र
क्या यही हैं अंतिम सत्य?
अस्तित्व ही दोष मेरा?
दरिद्रता प्रारब्ध मेरी?
तिमिरमय सृष्टि,
नैराश्य अनंत,
अनवरत क्लेश,
क्या यही मेरी परिभाषा?
फिर क्यों आकुल
अन्तस्थ मैं?
संकीर्णता को लांघ-लांघ
क्यों फिर प्रयास?
फिर क्यों अभिलाषा?
आकर्षण फिर क्यों असीम का?
सुख में भी संताप क्यों?
क्यों चैतन्य सार मनुज का?
विस्मय!
परा की चाह ही क्यों?
क्या मैं दो हूँ?
खंडित
ध्रुवित और विपरीत!
अधो-उर्ध्व से युक्त
द्वैत अस्तित्व!
प्रबल भेद
और अभेद छद्म!
यौगिक व्यक्तित्व
अस्थिर निज
अनियत आकार!
चरम एक ही तथ्य
सतत संघर्ष
मुझमे,
मुझ दोनों में!

प्रश्न


संयोग उपज
जीवन यह क्षण भर
बिंदुओं का संघात
निरर्थक!
अथवा निहित प्रयोजन
व्यापक!
सत्य जगत;
कष्ट; परमार्थ!
सत्य मैं!
या सब असत्य!
प्रश्न रहा हूँ
प्रश्न रहूँगा
मैं;
मुझ संग सर्वस्व.