बढ़े कदम हैं आज
भले हों कष्ट
अगिन अवरोध
मार्ग में कंट
नयन निर्लक्ष्य
साँस थक-थक
चाल धीमी ही क्यों न हो जाए!
चलना ही है ध्येय
इसी का मैं अभिलाषी हूँ.
लक्ष्य बिना साकार नहीं
जीवन कोई,
ये सुना.
विजय का ही सर्वोच्च मूल्य
ये सुना.
निरंतर.
पर जीवन क्या नहीं
प्रवाह अविरल,
गति हर क्षण?
एक बिंदु क्या हो सकती
परिभाषा मार्ग अनंत की?
असंख्य नरों से रचित
वृहद् ब्रह्माण्ड,
किन्तु फिर भी संघर्ष
अहम्, जीत, अभिमान,
चहुँदिश स्व का ही गुणगान.
स्व की हार से
अधिक प्रफुल्लित होऊं
मैं ऐसा प्राणी हूँ.
लक्ष्य एक का नहीं
मार्ग अविरल का
किन्तु पुजारी हूँ.
सूख, वृक्ष से गिरे कभी
वो पात नहीं, चिंगारी हूँ.
कृपादृष्टि की चाह नहीं,
मैं
मानवता-व्रत धारी हूँ.
No comments:
Post a Comment