Sunday, July 29, 2012

सपने


सपने कभी बूढ़े नहीं होते
कभी मरते हैं
भले टूट जाएँ
बेआवाज़
भले हम उन्हें दफ़न कर दें
जिन्दा ही.
टुकड़े हुए सपनों की
जिंदगियां जुड़ जाती हैं
और वे अमर हो जाते हैं.
हम भी तो सपने ही हैं
टूटते हैं बेआवाज़
दफ़न होते जिन्दा
पर मरते नहीं
जीते हैं टुकड़ों में 
ज़िन्दगी रिस रिसकर 
बह जाती है हमसे,
हम टुकड़ों से.
सपने हमको जीते हैं
श्वांस से श्वांस तक
कभी मरते नहीं
टूटकर - बिखरकर
जिन्दा दफ़न हो कर
पर कभी बूढ़े नहीं होते
और मरते भी नहीं.

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