Friday, July 20, 2012

द्वैत


इन्द्रियाँ पहचान
सीमित क्षण तक
बाधित दृष्टि
अगणित क्लेश
द्वेष-राग से युक्त
सर्वत्र अहम्
अनवरत!
वंचना बहुरत्नों से
जो हैं सार मनुजता के
विवेक, सृजन,
परादृष्टि,
चैतन्य और अभेद.
वंचित, दरिद्र.
दासता स्वयं की
सीमित अपनी ही सीमाओं से
व्यथा स्वरचित
दृष्टि स्वबाधित
कारण अनन्य
सिर्फ मैं!
मैं केवल क्षुद्र
क्या यही हैं अंतिम सत्य?
अस्तित्व ही दोष मेरा?
दरिद्रता प्रारब्ध मेरी?
तिमिरमय सृष्टि,
नैराश्य अनंत,
अनवरत क्लेश,
क्या यही मेरी परिभाषा?
फिर क्यों आकुल
अन्तस्थ मैं?
संकीर्णता को लांघ-लांघ
क्यों फिर प्रयास?
फिर क्यों अभिलाषा?
आकर्षण फिर क्यों असीम का?
सुख में भी संताप क्यों?
क्यों चैतन्य सार मनुज का?
विस्मय!
परा की चाह ही क्यों?
क्या मैं दो हूँ?
खंडित
ध्रुवित और विपरीत!
अधो-उर्ध्व से युक्त
द्वैत अस्तित्व!
प्रबल भेद
और अभेद छद्म!
यौगिक व्यक्तित्व
अस्थिर निज
अनियत आकार!
चरम एक ही तथ्य
सतत संघर्ष
मुझमे,
मुझ दोनों में!

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