कल मैंने विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मलेन की वार्षिक सदस्यता ली....
नागपुर स्थित यह संस्था कला, साहित्य, संस्कृति, सृजन आदि के लिये समर्पित है.
कल
इसका वार्षिक अधिवेशन भी था. चूंकि मैं नया था, इसलिए मैंने
एक सज्जन से इस संस्था की गतिविधियों के बारे में उनसे पूछा. उन्होंने बताया कि
यहाँ वर्ष भर विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक क्रियाकलाप होते रहते हैं. यहाँ युवा
कलाकारों को साहित्य, सृजन, नृत्य,
रंगमंच आदि कला के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा को प्रस्तुत
करने का अवसर भी मिलता है.
फिर
अंत में उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि यहाँ आपको चलना सिखा दिया जाता
है... लेकिन उड़ना आपको खुद ही होगा... और पंख भी आपके ही होंगे.
मैंने
उन्हें विनम्रता से उत्तर दिया: सर, चल भी मैं खुद
ही लूँगा.. बस मुझे ज़मीन चाहिए.
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