Tuesday, November 26, 2013

कौन तय करे?

कभी रास्ते, कभी पगडंडियाँ
चलना, कभी दौड़ना
रुकने की फुर्सत नहीं
बढ़ते ही जाना है
कहाँ, क्यों?
कौन तय करे?
बिसात है, पासे हैं
चाल है, पराजय है
खेलता कौन?
कौन तय करे?
ये पाना है, वो भी पाना है
ये हासिल किया
हाय! वो छूट गया
पराजय में शोक, विजय पर अभिषेक
स्पर्धा है क्या?
कौन तय करे?
मृत्यु का अभाव है जीवन
या जीवन का अभाव मृत्यु?
मृत्यु की प्रतीक्षा है जीवन
या जीवन की परिणति मृत्यु?
हर क्षण है जीवन
या प्रति क्षण मृत्यु?
कौन तय करे?

Wednesday, October 23, 2013

दो दुनिया

सुन लो मेरे संगी साथी
बोलूँ अपनी बात
याद नहीं कब सदियाँ बीतीं
हुआ हूँ अब आज़ाद |
ना जाने क्यों दो दुनिया थी
ज्ञात और अज्ञात
पिंजरे ही के अकट जाल के
इस पार और उस पार |
स्वर्ण रश्मियाँ चहुँ ओर
केवड़े का था सुवास
भोजन में थे छप्पन भोग
और शयन को मखमल लाल |
ऐसी थी वह दुनिया जिसकी
चाहत हर मानुष को थी
मरते कटते थे आपस में
प्राणों से मुद्रा प्यारी थी |
कैसा था वह अजब विश्व
ना जाने कैसे प्राणी थे !
आज़ाद हवा की क़द्र नहीं
बंधन ही के अधिकारी थे |
गर्व मुझे मेरे घर का
है जहाँ बसे मन-प्राण मेरे
जड़-भोग व मुद्रा तुच्छ जहाँ
बस मित्रों का ही प्यार मिले |
सम्पदा जहाँ उन्मुक्त गगन
बहती हवा, झरने का जल |
कीमत क्या इनके खजानो की
जाने मानव उस पार
सभ्यता और बुद्धि कहते
हैं जिसके पास अपार |
शुक्र है ऊपरवाले का
मैं भी हूँ उस पार नहीं
मेरी दुनिया मेरा कंचन

दूजी दुनिया स्वीकार नहीं |

Sunday, May 5, 2013

आकर्षण का नियम


आकर्षण का नियम कहता है
होती है पूरी हर इच्छा
जिसमें हों तीव्रता
और निरंतरता.
उन बेसहारों की चाह में
क्या कम होती है तीव्रता
जो करते हैं
चाह रोटी की,
चाह छाँव की,
चाह हमदर्दी की?
क्या कम होती है
इन चाहों में निरंतरता, दृढ़ता?
क्यों नहीं होती पूरी
चाहें असहायों की?
क्या होता है आकर्षण का नियम भी
वर्गभेदी?

चमक


खिड़की के बाहर झाँक कर देखा
बूढ़े तालाब की सतह पर
चमकते हुए अनगिनत बिंदु.
सोचा, तारे तो नहीं!
वे तो रात में चमकते हैं!
जुगनू भी नहीं,
अभी तो भरी दुपहरी है!
क्या पानी की चमक है यह?
लहरों में हिल-डोलकर
सूरज से होड़ लगाती
उसी की रश्मियों को पलटाती
और बिखेरती
अपनी शीतलता की चमक.
क्या किसी ने देखी
मेरी आँखों में भी
होड़ की, रश्मियों की,
और शीतलता की चमक?

Tuesday, April 23, 2013

मेरा परिचय


गुमशुदा
खुद की तलाश में.
अंतस में डुबकी
ऊँचाई की आस में.
निरंतर बिना उत्तर
एक प्रश्न
मेरा अस्तित्व.

वह भगवान बनाती


प्लेटफोर्म पर थी वो
फिरती इधर-उधर
अपने हाथ फैलाये
भगवान के नाम पर मांगती.
उस भगवान के नाम पर
जिसने उसे बनाया
या फिर उस भगवान के नाम पर
जिसे उसने बनाया !
उसके चेहरे पर झुर्रियाँ थीं
या झुर्रियों में चेहरा !
जो भी हों, थे दोनों.
वरना बिना झुर्रियों के भी चेहरा होता है
तभी तो आइने बिकते हैं दुनिया में.
और बिना चेहरे के भी झुर्रियाँ होती हैं.
नहीं आता यकीन, तो झाँक लो
लोगों के दिलों में,
जहाँ अब चेहरे नहीं मिलते
मिलती हैं सिर्फ झुर्रियाँ.
मुझसे भी माँगा उसने
मैंने भी उसे एक रूपया दिया
और उस क्षण में उसका भगवान बन गया.
वह फिर बढ़ गई
अपने अगले भगवान कि तलाश में
फिरती इधर-उधर
अपने हाथ फैलाये
उसी प्लेटफोर्म पर
लोगों को भगवान बनाती.

Thursday, April 11, 2013

प्यास


ट्यूबवेल से बोली मैना
अब तो तू चुप चाप ही रहना
बहुत हो चुकी मेरी प्रतीक्षा
चरम गई पानी की इच्छा
अब मैं अपनी राह गढूंगी
स्व-बलिदान से नहीं डरूँगी
नभ तो पर से नाप चुकी हूँ
चोंच चला धरती खोदूंगी
नीत भुला मानव बैठा है
नव युग की मैं नीत बनूँगी |