खिड़की के बाहर झाँक कर
देखा
बूढ़े तालाब की सतह पर
चमकते हुए अनगिनत
बिंदु.
सोचा, तारे तो नहीं!
वे तो रात में चमकते
हैं!
जुगनू भी नहीं,
अभी तो भरी दुपहरी है!
क्या पानी की चमक है
यह?
लहरों में हिल-डोलकर
सूरज से होड़ लगाती
उसी की रश्मियों को
पलटाती
और बिखेरती
अपनी शीतलता की चमक.
क्या किसी ने देखी
मेरी आँखों में भी
होड़ की, रश्मियों की,
और शीतलता की चमक?
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