सुन लो मेरे संगी साथी
याद नहीं कब सदियाँ
बीतीं
हुआ हूँ अब आज़ाद |
ना जाने क्यों दो
दुनिया थी
ज्ञात और अज्ञात
पिंजरे ही के अकट जाल
के
इस पार और उस पार |
स्वर्ण रश्मियाँ चहुँ
ओर
केवड़े का था सुवास
भोजन में थे छप्पन भोग
और शयन को मखमल लाल |
ऐसी थी वह दुनिया जिसकी
चाहत हर मानुष को थी
मरते कटते थे आपस में
प्राणों से मुद्रा
प्यारी थी |
कैसा था वह अजब विश्व
ना जाने कैसे प्राणी थे
!
आज़ाद हवा की क़द्र नहीं
बंधन ही के अधिकारी थे
|
गर्व मुझे मेरे घर का
है जहाँ बसे मन-प्राण
मेरे
जड़-भोग व मुद्रा तुच्छ
जहाँ
बस मित्रों का ही प्यार
मिले |
सम्पदा जहाँ उन्मुक्त
गगन
बहती हवा, झरने का जल |
कीमत क्या इनके खजानो
की
जाने मानव उस पार
सभ्यता और बुद्धि कहते
हैं जिसके पास अपार |
शुक्र है ऊपरवाले का
मैं भी हूँ उस पार नहीं
मेरी दुनिया मेरा कंचन
दूजी दुनिया स्वीकार नहीं |

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