Wednesday, October 23, 2013

दो दुनिया

सुन लो मेरे संगी साथी
बोलूँ अपनी बात
याद नहीं कब सदियाँ बीतीं
हुआ हूँ अब आज़ाद |
ना जाने क्यों दो दुनिया थी
ज्ञात और अज्ञात
पिंजरे ही के अकट जाल के
इस पार और उस पार |
स्वर्ण रश्मियाँ चहुँ ओर
केवड़े का था सुवास
भोजन में थे छप्पन भोग
और शयन को मखमल लाल |
ऐसी थी वह दुनिया जिसकी
चाहत हर मानुष को थी
मरते कटते थे आपस में
प्राणों से मुद्रा प्यारी थी |
कैसा था वह अजब विश्व
ना जाने कैसे प्राणी थे !
आज़ाद हवा की क़द्र नहीं
बंधन ही के अधिकारी थे |
गर्व मुझे मेरे घर का
है जहाँ बसे मन-प्राण मेरे
जड़-भोग व मुद्रा तुच्छ जहाँ
बस मित्रों का ही प्यार मिले |
सम्पदा जहाँ उन्मुक्त गगन
बहती हवा, झरने का जल |
कीमत क्या इनके खजानो की
जाने मानव उस पार
सभ्यता और बुद्धि कहते
हैं जिसके पास अपार |
शुक्र है ऊपरवाले का
मैं भी हूँ उस पार नहीं
मेरी दुनिया मेरा कंचन

दूजी दुनिया स्वीकार नहीं |